Narsi Bhagat ki Katha: भारत की पवित्र भूमि संतों, साधकों और भक्तों की तपोभूमि रही है। इस धरती पर श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिव, श्री विष्णु, माता दुर्गा और पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के अनगिनत भक्त हुए हैं। इन्हीं भक्तों में से एक थे श्री कृष्ण के परम भक्त नरसी मेहता, जिनके पास 56 करोड़ की अकूत संपत्ति थी, लेकिन स्वभाव से वे अत्यंत कंजूस थे। यह कथा है कि कैसे पूर्ण परमात्मा ने नरसी सेठ के हृदय को परिवर्तित कर उन्हें सच्चे भक्त के रूप में स्थापित किया। इस लेख में हम नरसी जी की जीवनी, उनके जीवन में परमात्मा के चमत्कार और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को विस्तार से जानेंगे।
नरसी मेहता: एक संक्षिप्त परिचय
Narsi Bhagat ki Katha: लगभग 500-600 वर्ष पूर्व, गुजरात में नरसी मेहता नामक एक धनाढ्य सेठ रहते थे। वे श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे, लेकिन उनकी संपत्ति, जो आज के समय में अरबों-खरबों के बराबर होगी, उनके लिए माया का जाल बन गई थी। नरसी जी अत्यंत कंजूस थे और एक चवन्नी भी दान नहीं करते थे। उनकी एकमात्र पुत्री थी, जिसका विवाह वे कर चुके थे। उस समय, नरसी जी के नाम की हुण्डी (आज के बैंक ड्राफ्ट के समान) चलती थी, जिसे राजा द्वारा मान्यता प्राप्त थी। यह हुण्डी धन के लेन-देन का साधन थी, और नरसी जी जैसे धनी सेठ इसका उपयोग करते थे।
परमात्मा कहते हैं, “माया को सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए, जैसे मोटरसाइकिल को सिर पर नहीं रखते, बल्कि उसका उपयोग करते हैं।” लेकिन नरसी जी माया से इतने चिपके थे कि दान-धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं था। फिर भी, परमात्मा की कृपा से उनकी यह कंजूसी उनके मोक्ष के मार्ग में बाधा नहीं बनी। आइए, जानते हैं कैसे परमात्मा ने नरसी जी को सच्चे भक्त का मार्ग दिखाया।
गंगा स्नान और परमात्मा का पहला मिलन
Narsi Bhagat ki Katha: एक दिन नरसी जी की पत्नी ने उनसे गंगा स्नान की इच्छा जताई। नरसी जी ने पहले तो खर्च के डर से मना किया, लेकिन पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर वे गंगा स्नान के लिए चल पड़े। गंगा तट पर स्नान करते समय पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब साधु रूप में प्रकट हुए और नरसी जी से दान मांगने लगे। उन्होंने श्री कृष्ण की महिमा सुनाई, क्योंकि नरसी जी श्री कृष्ण के भक्त थे।
परमात्मा ने कहा, “सेठ जी, गंगा स्नान का पुण्य तभी पूर्ण होता है, जब दान किया जाए।” नरसी जी ने कंजूसी दिखाते हुए कहा, “मेरे पास तो पैसे ही नहीं हैं, आप किसी और से मांग लें।” उनकी पत्नी ने आग्रह किया कि कुछ दान दे दें, लेकिन नरसी जी टस से मस नहीं हुए। अंत में, परमात्मा ने कहा, “ठीक है, एक टका (पैसा) ही दे दो।” नरसी जी ने कहा, “वह भी मेरे पास नहीं है, लेकिन घर पर आ जाइए, वहां दे दूंगा।”
नरसी जी आगे-आगे, परमात्मा पीछे-पीछे
गंगा स्नान के बाद नरसी जी अपने घर लौटे। पीछे-पीछे ब्राह्मण वेश में परमात्मा भी उनके घर पहुंच गए। नौकरों ने सेठ जी को बताया कि एक ब्राह्मण एक टका मांगने आया है। नरसी जी ने सोचा, “यह तो बड़ा ढीठ है, मेरे पीछे-पीछे चला आया।” उन्होंने नौकरों से कहलवाया कि वे थक गए हैं, कल दे देंगे। परमात्मा ने कहा, “कोई बात नहीं, मैं कल आ जाऊंगा।” रात को वे नरसी जी के बगीचे में चादर बिछाकर सो गए।
अगली सुबह परमात्मा ने फिर दरवाजा खटखटाया। नरसी जी ने फिर बहाना बनाया कि वे बीमार हैं। कई दिन तक यही सिलसिला चला। अंत में, नरसी जी ने नौकरों से कहलवाया कि सेठ जी की मृत्यु हो गई। परमात्मा ने कहा, “यह तो दुखद समाचार है। मैं सेठ जी का अंतिम संस्कार करवाकर ही जाऊंगा।”
नरसी जी का नकली अंतिम संस्कार
Narsi Bhagat ki Katha: नरसी जी ने सोचा कि ब्राह्मण को भगाने का यह अंतिम उपाय है। उन्होंने नौकरों से लकड़ियां ढोने और नकली अर्थी तैयार करने को कहा। वे स्वयं अर्थी पर लेट गए, और नौकर उन्हें श्मशान घाट ले गए। वहां परमात्मा ने लकड़ी नीचे रखकर कहा, “सेठ जी, आप एक टके के लिए जान देने को तैयार हैं? मैं आपका एक टका माफ करता हूं।” इतना कहकर परमात्मा वहां से चले गए। नरसी जी ने राहत की सांस ली और घर लौट आए, लेकिन उनकी कंजूसी अभी भी कम नहीं हुई थी।
परमात्मा का नरसी रूप और कोर्ट का फैसला
अगले दिन नरसी जी जंगल में सैर करने गए। इस बीच, परमात्मा ने नरसी जी का रूप धारण किया और उनके घर पहुंच गए। उन्होंने नौकरों को हिदायत दी, “कोई बहरूपिया मेरा रूप बनाकर आए, तो उसे अंदर मत आने देना।” जब असली नरसी जी घर लौटे, तो नौकरों ने उन्हें बहरूपिया समझकर मारना शुरू कर दिया। नरसी जी भागकर थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज की कि किसी ने उनकी संपत्ति हड़प ली है।
कोर्ट में असली और नकली नरसी आमने-सामने थे। जज ने नरसी जी की बही (खाता-बही) मंगवाई और पूछा, “इसमें क्या-क्या लिखा है?” असली नरसी कुछ ही बातें बता सके, जबकि परमात्मा ने बही का हर विवरण बता दिया। कोर्ट ने परमात्मा को असली और नरसी जी को नकली सिद्ध कर दिया।
जंगल में परमात्मा का पुनर्मिलन और ज्ञान
Narsi Bhagat ki Katha in Hindi: निराश नरसी जी जंगल में बैठकर रोने लगे। तभी परमात्मा ब्राह्मण रूप में प्रकट हुए और बोले, “बेटा, यह संपत्ति तुम्हारी थी या मेरी?” नरसी जी ने कहा, “थी तो मेरी, लेकिन अब मेरी नहीं रही।” परमात्मा ने समझाया, “यह संपत्ति हमेशा मेरी थी। तुमने इसे अपने सिर पर चढ़ा रखा था। अगर तुम इसे दान-धर्म में लगाओ, तो मैं तुम्हें वापस दे सकता हूं।”
नरसी जी को अपनी भूल समझ आई। परमात्मा ने उन्हें सच्चा ज्ञान और नाम दीक्षा दी। नरसी जी ने अपनी सारी संपत्ति भंडारे और दान में लगा दी। वे जंगल में झोपड़ी बनाकर परमात्मा की भक्ति में लीन हो गए। परमात्मा कहते हैं:
कबीर, सब जग निर्धना, धनवंता ना कोय।
धनवंता सो जानिये, जा पै राम नाम धन होय।।
नरसी जी की नातिन के विवाह में परमात्मा का चमत्कार
Narsi Bhagat ki Katha: नरसी जी की एकमात्र पुत्री की बेटी, यानी उनकी नातिन, का विवाह होने वाला था। उस समय नरसी जी निर्धन हो चुके थे। उनके पास भात (विवाह में दिया जाने वाला उपहार) भरने के लिए कुछ नहीं था। उनके साथ 16 सूरदास (अंधे भक्त) थे, जो प्रभु भक्ति में उनके साथी थे। नरसी जी ने पुरानी बैलगाड़ी और कमजोर बैल उधार लिए कर यात्रा शुरू की, लेकिन गाड़ी बार-बार रुक रही थी।
नरसी जी ने परमात्मा को याद किया। तभी परमात्मा बढ़ई (कारीगर) के रूप में प्रकट हुए और बोले, “मैं तुम्हारी गाड़ी ठीक कर देता हूं।” नरसी जी ने कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं।” परमात्मा ने कहा, “मुझे पैसे नहीं चाहिए, बस रास्ते भर भजन सुनाता चल।” परमात्मा ने गाड़ी ठीक की और स्वयं गाड़ी हांकने लगे। गाड़ी हवा की तरह तेजी से चलने लगी। कुछ ही घंटों में वे गंतव्य के पास पहुंच गए। परमात्मा ने कहा, “मेरा गांव आ गया, अब तुम गाड़ी संभालो।”
जब परमात्मा चले गए, तो गाड़ी फिर से लचर-पचर चलने लगी। एक समझदार सूरदास, शिक्षण, ने कहा, “नरसी जी, वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, स्वयं परमात्मा थे।” नरसी जी को अपनी भूल का अहसास हुआ।
विवाह स्थल पर पहुंचने पर समधन और पड़ोसियों ने नरसी जी का मजाक उड़ाया, “यह कंगाल क्या भात भरेगा? पत्थर डालेगा।” नरसी जी की आंखों में आंसू आ गए। तभी परमात्मा ने चमत्कार किया। आकाश से सोने-चांदी के पत्थर और नोटों की बारिश हुई। एक गाड़ी दहेज के सामान से भरी हुई प्रकट हुई, जिसमें डेढ़ सौ तील (कपड़े) थे। परमात्मा ने समधन को डांटते हुए कहा, “मेरे भक्त का अपमान मत कर।” इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।
नरसी जी की हुण्डी और सांवल शाह का चमत्कार
जब नरसी जी निर्धन हो गए, तो उनकी हुण्डी का पंजीकरण रद्द हो चुका था। एक बार चार संत 500 रुपये की हुण्डी बनवाने नरसी जी के पास आए। नगरवासियों ने मजाक में कहा कि नरसी जी अब भी हुण्डी बनाते हैं। नरसी जी ने मना किया, लेकिन संतों के आग्रह पर उन्होंने सांवरिया सेठ (श्री कृष्ण) के नाम की हुण्डी बना दी। उन्होंने उन 500 रुपये से भंडारे के लिए सामान खरीदा।
संत द्वारिका पहुंचे और सांवल शाह सेठ का पता पूछा। वहां के सेठों ने कहा कि नरसी जी ने ठग लिया, क्योंकि ऐसा कोई सेठ नहीं है। संत निराश हो गए। उधर, नरसी जी ने ध्यान लगाकर देखा कि संत दुखी हैं। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि भंडारे का कुछ सामान बचा है या नहीं। पत्नी ने बताया कि थोड़ा पलोथन (सूखा आटा) बचा है। नरसी जी ने उससे चार रोटियां बनवाईं और एक संत रूपी परमात्मा को खिला दीं।
परमात्मा ने चार रोटियां खाकर द्वारिका में सांवल शाह सेठ के रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने संतों को 500 रुपये दिए और कहा, “नरसी जी की हुण्डी बिल्कुल सही है। चाहे लाख की हुण्डी भेज देना, मैं नकद कर दूंगा।” यह देखकर द्वारिका के सेठ हैरान रह गए। परमात्मा ने चांदी के सिक्के गिनकर संतों को दिए और अंतर्ध्यान हो गए।
निष्कर्ष: परमात्मा का भक्त के प्रति प्रेम
नरसी भक्त की कथा हमें सिखाती है कि पूर्ण परमात्मा अपने भक्तों के लिए हर रूप में प्रकट होकर उनकी रक्षा करते हैं। चाहे वह श्री कृष्ण के रूप में हों, श्री राम के रूप में, या स्वयं कबीर साहेब के रूप में, परमात्मा अपने भक्तों के दुखों का निवारण करते हैं। नरसी जी की कहानी यह भी दर्शाती है कि भौतिक धन नाशवान है, लेकिन राम नाम का धन अनमोल और शाश्वत है।
परमात्मा कहते हैं:
कबीर, अंतरयामी एक तू, आतम के आधार।
जो तुम छाडौ हाथ, तो कौन उतारै पार।।
आइए, हम भी उस परमात्मा की शरण में जाएं और उनके गुणों का गान करें। अधिक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें और सच्चे मार्ग पर चलें।
FAQs: नरसी भक्त की संपूर्ण कथा
प्रश्न 1: नरसी मेहता कौन थे?
उत्तर: नरसी मेहता 500-600 वर्ष पूर्व गुजरात के एक धनाढ्य सेठ थे, जो श्री कृष्ण के परम भक्त थे। उनके पास 56 करोड़ की संपत्ति थी, लेकिन वे अत्यंत कंजूस थे। परमात्मा कबीर साहेब ने उन्हें सच्चा ज्ञान देकर भक्त बनाया।
प्रश्न 2: परमात्मा ने नरसी जी को क्यों चुना?
उत्तर: नरसी जी की आत्मा निर्मल थी, लेकिन माया के जाल में फंसकर उनका मानव जीवन बर्बाद हो रहा था। परमात्मा ने उनकी रक्षा के लिए उन्हें सच्चा ज्ञान दिया और मोक्ष का मार्ग दिखाया।
प्रश्न 3: नरसी जी ने परमात्मा से बचने के लिए क्या किया?
उत्तर: परमात्मा द्वारा दान मांगे जाने पर नरसी जी ने एक टका देने से बचने के लिए अपनी मृत्यु का नाटक किया और नकली अंतिम संस्कार करवाया।
प्रश्न 4: परमात्मा ने नरसी जी को सबक कैसे सिखाया?
उत्तर: परमात्मा ने नरसी जी का रूप धारण कर उनके नौकरों को विश्वास दिलाया कि असली नरसी बहरूपिया है। कोर्ट में भी परमात्मा ने नरसी जी की बही का पूरा विवरण देकर उन्हें नकली सिद्ध कर दिया।
प्रश्न 5: नरसी जी की नातिन के विवाह में परमात्मा ने क्या चमत्कार किया?
उत्तर: परमात्मा ने बढ़ई रूप में नरसी जी की बैलगाड़ी ठीक की और उन्हें विवाह स्थल तक पहुंचाया। वहां उन्होंने सोने-चांदी के पत्थर, नोटों की बारिश और दहेज से भरी गाड़ी प्रकट की।
प्रश्न 6: नरसी जी की हुण्डी का चमत्कार क्या था?
उत्तर: निर्धन होने के बावजूद नरसी जी ने सांवरिया सेठ के नाम की हुण्डी बनाई। परमात्मा ने द्वारिका में सांवल शाह सेठ बनकर संतों को 500 रुपये नकद दिए।
प्रश्न 7: नरसी जी की कथा से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: यह कथा सिखाती है कि भौतिक धन नाशवान है, लेकिन राम नाम का धन शाश्वत है। परमात्मा अपने भक्तों की हर स्थिति में रक्षा करते हैं।
प्रश्न 8: नरसी जी के जीवन में आए बदलाव क्या थे?
उत्तर: परमात्मा के ज्ञान से नरसी जी ने अपनी सारी संपत्ति दान-धर्म में लगा दी और सच्चे भक्त बनकर मोक्ष का मार्ग अपनाया।